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प्राचीन काल में भारत में हिंदू धर्म था ही नहीं। उन दिनों भारत में वैष्णव, शैव और शाक्त नाम के तीन सम्प्रदाय होते थे। वैष्णव विष्णु की, शैव शिव की और शाक्त शक्ति की पूजा आराधना किया करते थे। प्रत्येक सम्प्रदाय के समर्थक अपने देवता को दूसरे सम्प्रदायों के देवता से बड़ा समझते थे और इस कारण से उनमें वैमनष्य बना रहता था। वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि आदि अनेक ऋषियों और दार्शनिकों ने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण समझा और तीनों सम्प्रदायों के मध्य उत्पन्न हुये वैमनष्यता को समाप्त करने के उद्देश्य से लोगों को यह शिक्षा देना आरम्भ किया कि सभी देवता समान हैं, विष्णु, शिव और शक्ति आदि देवी-देवता परस्पर एक दूसरे के भक्त हैं। उनकी इस शिक्षा से तीनों सम्प्रदायों का मेल हुआ और सनातन धर्म की उत्पत्ति हुई। सनातन धर्म में विष्णु, शिव और शक्ति को समान माना गया और तीनों ही सम्प्रदाय के समर्थक इस धर्म को मानने लगे। सनातन धर्म के वेद, पुराण, श्रुति, स्मृति, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, गीता आदि सारे साहित्य संस्कृत भाषा में रची गईं थीं। कालान्तर में भारतवर्ष में मुगलों का शासन हो जाने के कारण देवभाषा संस्कृत का ह्रास हो गया तथा सनातन धर्म की अवनति होने लगी। इस स्थिति को सुधारने के लिये विद्वान संत तुलसीदास ने प्रचलित भाषा में धार्मिक साहित्य की रचना करके सनातन धर्म की रक्षा की। 19वीं शताब्दी के पूर्व तक हिंदू शब्द था ही नहीं, हिंदू शब्द अंग्रेजों की देन है। जब औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन को ईसाई, मुस्लिम आदि धर्मों के मानने वालों का तुलनात्मक अध्ययन करने के लिये जनगणना करने की आवश्यकता पड़ी तो सनातन शब्द से अपरिचित होने के कारण उन्होंने यहाँ के धर्म का नाम सनातन धर्म के स्थान पर हिंदू धर्म रख दिया।
कृति स्रोत: http://kriti.agoodplace4all.com
जी.के. अवधिया हिंदी के प्रति समर्पित लेखक हैं। कृपया उनके हिंदी वेबसाइट का अवलोकन करें।
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